Saturday, April 25, 2015

Copied of Rashmi Ranjan
"कर्नल, किसान मुआवजा और केजरीवाल"
आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ विधायक कर्नल देवेंदर शेहरावत का दिल्ली में हुए कल आम आदमी पार्टी के जंतरमंतर पर किसान रैली से अनुपस्थित रहना न सिर्फ चौकाने वाला रहा बल्कि कई सवाल भी पैदा करता है।
ये बात अलग है की केजरीवाल रैली के केंद्र में रहने के कारण TRP प्रेमी मीडिया भी इस बात से अनभिज्ञ थी।
ज्यादातर लोगो के जेहन में ये कोई सवाल भी पैदा नहीं करता क्यों। क्या संबंध है किसानो का देवेंदर शेहरावत से?
दरअसल सबसे पहले कर्नल देवेंदर शेहरावत ने किसानो के फसल बर्बादी का मामला उठाना शुरू किया था जब सारी राजनैतिक पार्टियों समेत आम आदमी पार्टी और खुद इस मुद्दे से दूर या अनभिज्ञ थें।
उन्होंने मीडिया को इस बात के लिए जागृत किया उन्हें दिल्ली के कई गावों में मीडिया को ले जाकर परिस्थिति से अवगत कराने के बाद ये मामला सुर्ख़ियों में आया
और ndtv के रविश कुमार समेत अन्य पत्रकारों समेत स्वयं केजरीवाल ने संज्ञान लिया।
कर्नल देवेंदर ने ही पूरी दिल्ली में खेतो और हुए नुकसान का जायजा लेकर प्रति एकड़ नुकसान का 20,000 रूपये का फार्मूला स्थापित करके दिया और इसपर विस्तृत रिपोर्ट बनाकर अरविन्द केजरीवाल को दी।
आदतानुसार केजरीवाल ने इसमें एक मौका देखा किसानो के हितैषी बनने का और रातोरात अपने प्रिय विधायकों जैसे संजीव बाल्यान और अन्य विधानसभा में जाकर मुआवजे की घोषणा शुरू कर दी और हर कोई इसे अरविन्द केजरीवाल के किसानो के सच्चे हितैषी होने का दावा करने लगा।
यहीं से मुद्दे का राजनैतिकरण शुरू हो गया। अध्ययन करने वाले और 20,000 रूपये का फार्मूला देने वाले कर्नल देवेंदर शेहरावत को भूलकर खुद इसे अमलीजामा पहनने में लग गए और विचित्र परिस्थितिया सामने आने लगी।
बकौल रवीश कुमार अपने ब्लॉग में कुछ यूँ लिखते है:
"शरद शर्मा की वो भी रिपोर्ट भी देखी थी कि दिल्ली सरकार ने बीस हज़ार रुपये प्रति एकड़ मुआवज़ा देने का ऐलान किया है लेकिन किसी किसान को मुआवज़ा नहीं मिला है। आपके ही विधायक देवेंद्र सहरावत दिल्ली और उसके आस-पास किसानों की इस समस्या को लेकर हरकत में आने वाले पहले नेताओं में से थे। अगर मुझे ठीक-ठीक याद है तो देवेंद्र सहरावत ने मीडिया को कई एसएमएस किया था कि स्थिति बहुत ख़राब है। तब से लेकर आज तक दिल्ली में कितने किसानों को मुआवज़ा दिया गया है इसकी कोई सार्वजनिक जानकारी नहीं है। जंतर-मंतर की रैली से दो दिन पहले की गई शरद शर्मा की रिपोर्ट बताती है कि वहां कोई सर्वे करने वाला नहीं गया है। किसान कब तक इंतज़ार करते लिहाज़ा गेहूं काटने लगे हैं।
शायद दिल्ली सरकार बिना सर्वे के ही चौपालों के ज़रिये किसानों को सीधे पैसा देने की बात कर रही है। ऐसी कोई चौपाल हुई है या नहीं मगर मोहल्ला सभा की विस्तृत रिपोर्ट अख़बारों में पढ़ी है। चौपाल में विधायक और प्रधान के बीच लोगों से पूछकर मुआवज़ा देने की बात वाकई नायाब है। अगर ऐसा है तो दिल्ली सरकार को अब तक मुआवज़ा बांट देना चाहिए था क्योंकि उसे बाकी सरकारों की तरह सर्वे करने और तहसीलदार से कलक्टर तक रिपोर्ट भेजने की लंबी प्रक्रिया से नहीं गुज़रना है। वैसे सर्वे वाले राज्यों में जहां पूरा सर्वे भले न हुआ हो केंद्र सरकार को रिपोर्ट दे दी गई है। यह भी एक किस्म का फर्ज़ीवाड़ा है जो चल रहा है।"
रवीश कुमार का ऊपर लिखा बयान न सिर्फ केजरीवाल के अपरिपक्वता दर्शाता है बल्कि मुद्दे को राजनैतिक लाभ के लिए भुनाने की कोशिश भी लगती है।
दरअसल केजरीवाल ने हड़बड़ी में अपनी हालत चक्रव्यूह में फसें अभिमन्यु सा कर लिया। कर्नल देवेंदर शेहरावत की रिपोर्ट देखकर 20,000 रूपये प्रति एकड़ की घोषणा कर वाहवाही तो लूट ली। पर उसे लागू करने में देवेंदर शेहरावत को दूर रखकर भूलकर ली। और उसे गलत तरीके से लागू करना चालू किया जिसके कारण अभी तक मुआवजे मिलने चालू तक नहीं हुए क्योंकि मुआवजे बिना सर्वे के ग्रामप्रधान और विधायक द्वारा दिया जाएगा।
यह एक बहुत ही गंभीर स्तिथि की ओर इशारा करता है और होने वाले मुआवजे घोटाले को भी आमंत्रण देता है क्योंकि:
1. ज्यादातर ग्रामप्रधान या तो प्रॉपर्टी डीलर हैं या राजनैतिक व्यक्ति हैं किसान कम हैं।
2. कई जमीने जिनपर खेती हो रही हैं किसानो के पास उसका मालिकाना हक़ नहीं है।
3. यमुना पुश्ता में खेती करनेवाले किसानो के पास कोई अपनी जमीन नहीं है कागजो में। पर वे सबसे गरीब है। उन्हें मुआवजे की सबसे ज्यादा जरुरत है। पर मालिकाना हक़ के बिना मुआवजा मिलना मुश्किल है।
4. अगर बिना जरूरतमंद किसानो चिन्हित किये मुआवजे बाटे जाते हैं तो संभावना है की ग्रामपंचायत के चहेतो को मुआवजे की रेवड़ियां मिलने लगे और असली किसान को मुआवजा पूरी तरह मिल नहीं पाएं।
5. हो सकता है की इससे प्रॉपर्टी डीलर और समर्थ फार्म मालिकों और खेत मालिकों की चांदी कटने लगे।
6. अगर बिना मालिकाना हक़ के मुआवजा बटता है तो संभव है कई झूठे और मृत्युप्राप्त किसानो के नाम पर बंदरबांट होने लगे और जनता का पैसा जरुरत मंदो को न मिल गलत लोगों को मिलने लगे।
मैंने जब ये जानने की कोशिश की कि देवेंदर शेहरावत कहाँ हैं तो जबाब मिला वो विपस्ना हेतु दिल्ली से बाहर गए हैं।
थोडा अजीब सा लगा देवेंदर शेहरावत जैसे किसान नेता का अरविन्द केजरीवाल के किसान रैली से दूर रहना और किसान मुआवजे के घोषणा में भी दूर रहना जबकि साडी रिपोर्ट और अध्ययन उनके द्वारा की गई है।
क्या कर्नल देवेंदर शेहरावत इन मुद्दों से खुद दूर चले गए या केजरीवाल सरकार उन्हें खुद दूर रखकर सारा श्रेय श्री अरविन्द केजरीवाल को देना चाहती है। यह एक प्रश्न बना हुआ है।